
नाना पाटेकर का एक हालिया वीडियो याद आ रहा है, जिसमें नाना पाटेकर एक स्कूल में बच्चों के बीच हैं और उनसे ‘क्रांतिवीर’ फिल्म का बहुचर्चित संवाद सुनाने की मांग हुई थी… नाना बच्चों के बीच फिल्मी संवाद सुनाने से पहले बचते हैं, लेकिन फिर सिर्फ सुनाते ही नहीं, संवाद के अंत में हाथ में चीरा लागने का वह एक्शन कुछ इस तरह करते हैं कि सब स्तब्ध रह जाते हैं। वह संवाद था…“यह मुसलमान का खून, यह हिन्दू का खून, बता इसमें कौन सा हिन्दू का कौन सा मुसलमान का?... भगवान ने सबसे खूबसूरत चीज़ इंसान बनाई थी, लेकिन नीचे देखने पर सब कीड़े बन गए हैं... तुम्हारी यह खामोशी कल तुम्हारे बच्चों के लिए रोना बन जाएगी।” दरअसल नाना जिस वक्त बच्चों के बीच यह संवाद सुना रहे थे, उनके जेहन में देश के मौजूदा हालात गूंज रहे थे। नाना के विचारों से कई बार आप असहमत हो सकते हैं लेकिन नाना की यही खासियत थी कि ऐसे किसी भी मौक़े पर वह अपने दिल की बात कहते हुए संदेश भी दे जाते थे। किसानों के मामले में उनकी बातें याद करने वाली हैं।
नाना पाटेकर को याद करना केवल एक अभिनेता को याद करना नहीं है। भारतीय सिनेमा में बहुत से कलाकार आए, लोकप्रिय हुए, पुरस्कार जीते और कुछ अपने अभिनय की कोई ऐसी छाप छोड़ गए जिसे समय मिटा नहीं सका। लेकिन नाना की कहानी इन सबसे थोड़ी अलग है। उन्होंने अभिनय को अपनी पहचान बनाया, मगर अंततः उनकी पहचान अभिनय से कहीं बड़ी हो गई- एक ऐसे आदमी की, जो किसानों की आत्महत्या पर बेचैन होता था, पानी के संकट को अपना सवाल मानता था और सूखाग्रस्त गांवों में जाकर लोगों के बीच खड़ा होता था।
8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में अचानक उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा ने एक विशिष्ट अभिनेता ही नहीं, एक विशिष्ट सार्वजनिक व्यक्तित्व भी खो दिया।
नाना पाटेकर यानी विश्वनाथ पाटेकर का फिल्मी सफर 1978 की गमन से शुरू हुआ। शुरुआती वर्षों में उन्होंने मराठी और हिन्दी फिल्मों के साथ रंगमंच पर भी अपनी पहचान बनाई। अंकुश, प्रतिघात, परिंदा, अंगार, तिरंगा, क्रांतिवीर, अग्निसाक्षी, खामोशी, अब तक छप्पन, अपहरण, राजनीति जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय के अलग-अलग रंग सामने आए। नाना खतरनाक खलनायक भी बने, अनुकरणीय नायक भी, चरित्र अभिनेता और हास्य कलाकार भी। ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी उसी अभिनेता का बिल्कुल दूसरा चेहरा था, जिसने ‘क्रांतिवीर’ में व्यवस्था से लड़ते एक जुझारू इंसान को विश्वसनीयता दी थी।
उनके अभिनय की सबसे बड़ी विशेषता शायद यह थी कि उसमें अभिनय कम और जीवन अधिक दिखाई देता था। आवाज, चेहरा, संवाद बोलने का ढंग- सबमें एक ऐसी बेचैनी थी जिसे कैमरा पकड़ लेता था। परिंदा के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, क्रांतिवीर के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार और अग्निसाक्षी के लिए फिर राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। यानी वह उन दुर्लभ अभिनेताओं में रहे जिन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और सह-अभिनेता, दोनों श्रेणियों में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बनाई।
लेकिन नाना को सिर्फ हिंदी सिनेमा के अभिनेता के रूप में देखना उनके योगदान को छोटा कर देना होगा। उनकी जड़ें मराठी रंगमंच और मराठी सिनेमा में थीं। मराठी उनके लिए सिर्फ एक भाषा नहीं, अभिनय की एक जमीन थी। डॉ. प्रकाश बाबा आमटे- द रियल हीरो में उन्होंने जिस तरह सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश आमटे का जीवन निभाया, वह अभिनय और उनके अपने सामाजिक सरोकारों के बीच एक दिलचस्प पुल बन गया। इस भूमिका के लिए उन्हें फिल्मफेयर मराठी का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला।
कुसुमाग्रज के प्रसिद्ध नाटक पर आधारित फिल्म ‘नटसम्राट’ में एक महान रंगकर्मी के जीवन की त्रासदी के ज़रिए उम्र, एकाकीपन, परिवार और कलाकार की अस्मिता जिस तरह उभरकर आयी वह नाना ही कर सकते थे। 2016 में आई इस फिल्म में नाना पाटेकर का अभिनय मराठी सिनेमा की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना गया। उन्हें इसके लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का सम्मान भी मिला।
और शायद यहीं से नाना की दूसरी यात्रा को समझने की कुंजी मिलती है। वह पर्दे पर आम आदमी की बेचैनी को जितनी तीव्रता से व्यक्त करते थे, वास्तविक जीवन में भी उस बेचैनी से बच नहीं पाए।
महाराष्ट्र के गांवों में किसानों की आत्महत्याओं ने उन्हें भीतर तक विचलित किया। 2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर नाम फ़ाउंडेशन (NAAM Foundation) की शुरुआत की। इसकी शुरूआत किसान आत्महत्या से प्रभावित परिवारों की तत्काल मदद से हुई, लेकिन जल्दी ही उन्हें यह समझ आ गया कि महज चेक बांट देने से किसानों की मुश्किलों का समधान नहीं होने वाला। इसके लिए पानी, खेती, गांव और रोजगार के मूल सवालों पर काम करना होगा।
इस इलाके में उनकी सक्रियता ही थी कि नाना ने शुरुआत में अपनी निजी कमाई से भी इसमें मदद की, जिसके ज़रिए विदर्भ और मराठवाड़ा में आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को आर्थिक सहायता मिली। बाद में ‘नाम फ़ाउंडेशन’ से यह काम संस्थागत रूप में आगे बढ़ाया।
नाना ने एक जगह कहा भी कि ‘मुझे देर से समझ आया कि किसान की मदद केवल आर्थिक राहत देने से नहीं हो सकती। यदि पानी नहीं है, तो किसान को पैसा देकर कुछ समय के लिए संकट टाला जा सकता है, खत्म नहीं किया जा सकता’। शायद इसीलिए उनके सामाजिक काम की धुरी धीरे-धीरे ‘किसान को बचाने’ से ‘किसान को आत्मनिर्भर बनाने’ की ओर गया। वह किसी को ‘बेचारा’ बनाकर मदद के खिलाफ थे।
उन्हें क़रीब से जानने वाले नाना की सामाजिक सक्रियता एक एक दूसरे पहलू की भी चर्चा करते हैं: अभी-अभी किसी चैनल पर एक टिप्पणी सुनी (नाम नहीं सुन पाया)- ‘वह दिखावे से दूर रहते थे। उन्होंने अपनी प्रसिद्धि को चंदा जुटाने के औजार की तरह जरूर इस्तेमाल किया, लेकिन खुद को किसी 'मसीहा' की तरह प्रस्तुत करने की कोशिश नहीं की। उनका स्वभाव ही कुछ ऐसा था- सीधा, कभी-कभी तल्ख, और बनावटी विनम्रता से दूर’।
शायद यही वजह है कि किसान और पानी के सवाल से उनका रिश्ता किसी सेलिब्रिटी के सामाजिक अभियान जैसा नहीं लगा। उसमें निजी बेचैनी दिखाई देती थी। महाराष्ट्र के सूखे और किसान आत्महत्याओं के बीच उनका हस्तक्षेप इसी बेचैनी से निकला था।
उनकी सार्वजनिक छवि में एक और दिलचस्प विरोधाभास था। पर्दे पर वह अक्सर क्रोध, हिंसा, सत्ता-विरोध और विद्रोह की आवाज बने; निजी जीवन में वह गांव, खेती, पानी और साधारण जीवन की ओर लौटते दिखाई दिए। फिल्मी चमक से दूर उनका ग्रामीण जीवन और खेती से जुड़ाव भी इसी का हिस्सा था। उनके बारे में हाल की स्मृतियों में उन्हें ऐसा अभिनेता बताया गया है जो अपनी जड़ों और खेती से जुड़े रहे।
नाना पाटेकर की विरासत इसलिए केवल क्रांतिवीर या नटसम्राट में नहीं है। वह उन गांवों में भी है जहां किसी सूखे कुएं में फिर पानी आया, उन किसान परिवारों में भी है जिन्हें संकट के समय सहारा मिला और उन बच्चों में भी है जिनकी पढ़ाई जारी रह सकी।
(सोशल मीडिया, इंटरनेट और चैनलों पर मौजूद इनपुट के साथ)
प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल @navjivanindia से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए