
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने रविवार को केंद्रीय बजट को लेकर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर निशाना साधा और आरोप लगाया कि उनका भाषण तथा बजट आर्थिक रणनीति और आर्थिक राजनीतिक दूरदर्शिता की कसौटी पर खरा नहीं उतरते।
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पूर्व वित्त मंत्री ने यह कटाक्ष भी किया कि सीतारमण ने या तो आर्थिक सर्वेक्षण को नहीं पढ़ा या फिर उसे जानबूझकर दरकिनार कर दिया।
चिदंबरम ने संवाददाताओं से कहा, ‘ आज संसद में वित्त मंत्री के भाषण में जो कुछ सुनने को मिला उससे अर्थशास्त्र का हर छात्र अवश्य ही स्तब्ध रह गया होगा। बजट केवल वार्षिक राजस्व और व्यय का बयान भर नहीं होता। मौजूदा परिस्थितियों में बजट भाषण को उन प्रमुख चुनौतियों पर एक स्पष्ट दृष्टिकोण पेश करना चाहिए, जिनका ज़िक्र कुछ दिन पहले जारी किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में किया गया था।’’
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उनके अनुसार, लेखाजोखा मानकों से भी देखें तो 2025-26 में वित्त प्रबंधन का यह एक बेहद खराब लेखा-जोखा था।
चिदंबरम ने कहा, ‘‘राजस्व प्राप्तियां 78,086 करोड़ रुपये कम रहीं, कुल व्यय 1,00,503 करोड़ रुपये कम रहा। राजस्व व्यय 75,168 करोड़ रुपये कम रहा और पूंजीगत व्यय में 1,44,376 करोड़ रुपये की कटौती की गई (केंद्र 25,335 करोड़ रुपये और राज्य 1,19,041 करोड़ रुपये)। इस दयनीय प्रदर्शन की व्याख्या करने के लिए एक शब्द तक नहीं कहा गया।’’
उन्होंने कहा कि वास्तव में, केंद्र का पूंजीगत व्यय 2024-25 में जीडीपी के 3.2 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में 3.1 प्रतिशत रह गया है।
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चिदंबरम ने कहा, ‘‘बजट भाषण की सबसे गंभीर आलोचना यह है कि वित्त मंत्री योजनाओं, कार्यक्रमों, मिशन, संस्थानों, पहल, कोष, समितियों आदि की संख्या बढ़ाते जाने से थकती नहीं हैं। मैंने इसको लेकर कम से कम 24 की गिनती की है। मैं आपकी (पत्रकार) कल्पना पर छोड़ता हूं कि इनमें से कितने अगले साल तक भुला दिए जाएंगे और गायब हो जाएंगे।’’
उनका कहना था, ‘‘आयकर अधिनियम, 2026 के पारित होने के महीनों बाद, जो एक अप्रैल, 2026 से लागू होगा, वित्त मंत्री ने कुछ दरों में छेड़छाड़ की है। यद्यपि अनेक छोटे-छोटे परिवर्तनों के प्रभाव की सावधानीपूर्वक जांच की जानी होगी। यह याद रखना चाहिए कि लोगों के विशाल बहुमत का आयकर या आयकर दरों से कोई सरोकार नहीं है।’’
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कांग्रेस नेता ने कहा, ‘‘बजट भाषण और बजट, आर्थिक रणनीति और आर्थिक राजनीतिक दूरदर्शिता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।’’
बजट में तमिलनाडु की कथित अनदेखी से जुड़े सवाल पर चिदंबरम ने कहा कि वित्त मंत्री ने बार-बार तमिलनाडु को खारिज किया है और राज्य में भाजपा की कोई हैसियत भी नहीं है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि मोदी सरकार किसी के दबाव में चाहबहार के मुद्दे परkf झुक गई।
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चिदंबरम ने कहा कि मैं कम से कम 10 ऐसी चुनौतियां गिना सकता हूँ, जिन्हें आर्थिक सर्वेक्षण और कई जानकार विशेषज्ञों ने चिन्हित किया है-
1.संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा लगाए गए दंडात्मक टैरिफ, जिन्होंने निर्माताओं, विशेष रूप से निर्यातकों, के लिए दबाव पैदा किया है
2. लंबे समय से चले आ रहे व्यापारिक संघर्ष, जो निवेश पर बोझ डालेंगे
3. बढ़ता हुआ व्यापार घाटा, विशेष रूप से चीन के साथ
4. सकल स्थिर पूंजी निर्माण (लगभग 30 प्रतिशत) का कम स्तर और निजी क्षेत्र की निवेश करने में हिचकिचाहट
5. भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के प्रवाह को लेकर अनिश्चित दृष्टिकोण और पिछले कई महीनों से विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) का लगातार बाहर जाना
6. राजकोषीय समेकन (fiscal consolidation) की बेहद धीमी गति और FRBM के विपरीत लगातार ऊँचा राजकोषीय घाटा और राजस्व घाटा
7.आधिकारिक रूप से घोषित मुद्रास्फीति के आँकड़ों और घरेलू खर्च, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन के वास्तविक बिलों के बीच लगातार बना रहने वाला अंतर
8. लाखों MSMEs का बंद होना और बचे हुए MSMEs का अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष
9. रोज़गार की अस्थिर स्थिति, विशेष रूप से युवाओं में बेरोज़गारी
10. बढ़ता शहरीकरण और शहरी क्षेत्रों (नगरपालिकाओं और नगर निगमों) में बिगड़ता बुनियादी ढांचा
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उन्होंने आगे कहा कि इनमें से किसी भी मुद्दे को वित्त मंत्री के भाषण में संबोधित नहीं किया गया। इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं था कि तालियां औपचारिक-सी थीं और अधिकांश श्रोता बहुत जल्दी ध्यान हटाकर अलग हो गए। यहां तक कि संसद टीवी द्वारा किया गया प्रसारण भी कुछ बार बंद हो गया!
एक अकाउंटेंट के मानकों से भी देखें तो 2025-26 में वित्त प्रबंधन का यह एक बेहद खराब लेखा-जोखा था।
राजस्व प्राप्तियां 78,086 करोड़ रुपये कम रहीं, कुल व्यय 1,00,503 करोड़ रुपये कम रहा। राजस्व व्यय 75,168 करोड़ रुपये कम रहा और पूंजीगत व्यय में 1,44,376 करोड़ रुपये की कटौती की गई (केंद्र 25,335 करोड़ रुपये और राज्य 1,19,041 करोड़ रुपये)।
इस दयनीय प्रदर्शन की व्याख्या करने के लिए एक शब्द तक नहीं कहा गया। वास्तव में, केंद्र का पूंजीगत व्यय 2024-25 में GDP के 3.2 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में 3.1 प्रतिशत रह गया है। राजस्व व्यय में की गई कटौतियां उन मदों में पड़ी हैं जो आम लोगों से संबंधित हैं।
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