
चुनाव आयोग ने बयान जारी कर माना है कि दो आयुक्तों ने कई फैसलों पर असहमति जताई थी
आयोग ने इसे अंदरूनी प्रक्रिया का हिस्सा बताया है
आयोग ने आयोग में मतभेद को 'तस्वीर का सिर्फ एक पहलू' करार दिया है
कई अहम मुद्दों पर आयोग खामोश है
चुनाव आयोग ने एक तरह से इस बात को खारिज किया है कि आयोग के आयुक्तों के बीच किसी मुद्दे को लेकर कोई मतभेद है। फिर भी आयोग ने इंडियन एक्सप्रेस की जांच में सामने आए उन तथ्यों और उन 14 आपत्तियों, उनके दर्ज होने की तारीखों या उनमें लिखी बातों पर कोई सवाल नहीं उठाया है। चुनाव आयोग ने इन्हें "सुझाव" बताया है। आयोग ने कहा है कि पिछले साल चुनाव आयोग का हर फ़ैसला सर्वसम्मति से लिया गया था। लेकिन अपने अधिकारिक बयान में आयोग ने यह नहीं बताया कि फ़ॉर्म 6 किसने बदला, बंगाल से जुड़ी अपीलें किसने दायर कीं, या मई से अगस्त के बीच पूरे आयोग की कोई बैठक क्यों नहीं हुई।
आयोग ने अपने बयान में दोनों चुनाव आयुक्तों के नोट को फैसला लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बताया है। लेकिन इन नोट्स में आयुक्तों ने जो चिंताएं जताई हैं उनका कोई जवाब नहीं दिया है।
आयोग ने प्रेस नोट में कहा है कि, "किसी भी संस्थान में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां होना एक सामान्य बात है। ये अंतिम निर्णय लेने से पहले निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं।" आयोग ने कहा कि इसके सदस्यों द्वारा दिए गए "लिखित नोट, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-और-संतुलन" "मानक, निरंतर चलने वाली प्रक्रियाएं" थीं, और "आयुक्तों द्वारा दिए गए सुझाव चुनावी प्रक्रियाओं को और बेहतर बनाने के लिए थे।"
चुनाव आयोग ने कहा कि हाल के महीनों में, आयोग ने कई फ़ैसले लिए हैं, निर्देश जारी किए हैं, लगभग 40 नई पहल शुरू की हैं और कई चुनावी सुधार किए हैं, जिनमें पूरे देश में मतदाता सूची में संशोधन (एसआईआर सहित) शामिल है। ये सभी फ़ैसले पिछले एक साल में पूरे आयोग की आम सहमति से लिए गए फ़ैसलों का नतीजा हैं। इसमें कहा गया है कि "10 महीनों के दौरान के कुछ खास अंदरूनी नोट/टिप्पणियों को उजागर करना, जबकि मंज़ूरी, फ़ैसले, निर्देश और पहलों के बहुत बड़े हिस्से को नज़रअंदाज़ कर देना, तस्वीर का सिर्फ़ एक पहलू दिखाता है"।
आयोग ने दोनों आयुक्तों (एस एस संधु और विवेक जोशी) के 14 नोटों में से किसी की मौजूदगी, उनकी तारीखों या उसमें कही गई बांतों को खारिज नहीं किया है। आयोग ने यह भी नही बताया है कि फॉर्म 6 में बदलाव को किसने मंजूरी दी, पश्चिम बंगाल में बहाल मतदाताओं के खिलाफ चुनाव आयोग की तरफ दायर लाखों अपीलों को किसने अधिकृत किया, ईसीआईनेट के ऑडिट के लिए दो आयुक्तों के प्रस्ताव का जवाब क्यों नहीं दिया गया।
वोटर लिस्ट के सॉफ़्टवेयर के बारे में आयोग ने कहा कि उसके डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म "बिना इजाज़त के छेड़छाड़ रोकने के लिए कड़े डेटा सुरक्षा नियमों के तहत काम करते हैं" और वोटर रजिस्ट्रेशन ऑफ़िसर (ईआरओ) और ज़िला चुनाव ऑफ़िसर (डीईओ) "कानून के तहत रजिस्ट्रेशन और नाम हटाने के लिए मिली कानूनी शक्तियों के अनुसार काम करते हैं"। लेकिन चुनाव आयुक्त एस एस संधू के 14 अगस्त के नोट में यह बात दर्ज थी कि ऑफ़िसर यह बता रहे थे कि उन्हें "ईआरओनेट (ERONet) पोर्टल का सही और पूरा एक्सेस नहीं मिल रहा है" और आयोग की आईटी के डायरेक्टर जनरल के पास उन्हें "रोकने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।"
आयोग का यह दावा कि फ़ैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे, इस बात भी जवाब नहीं देता कि दो आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई आपत्तियां फैसला लेने की प्रक्रिया में किस तरह शामिल की गईं।
इसका एक उदाहरण 'फॉर्म 6' है। 16 मई को चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने फ़ाइल पर यह दर्ज किया कि "रजिस्ट्रेशन ऑफ़ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 में संशोधन किए बिना इस फ़ॉर्म में बदलाव नहीं किया जा सकता" और प्रस्ताव को सरकार के पास भेजने की सलाह दी। दूसरे आयुक्त एस एस संधू ने 19 मई को इस बात से सहमति जताई।
इसके बाद जुलाई में, ऑनलाइन फ़ॉर्म पर एसआईआर डिक्लेरेशन दिखाई दिया। संधू को इसके बारे में 12 जुलाई को अखबार की खबर के जरिए जानकारी मिली। उन्होंने 13 अगस्त को उन्होंने लिखा कि यह बदलाव "दो चुनाव आयुक्तों की साफ़ राय के बावजूद" ऐसा फैसला किया गया। उन्होंने इसे "बिना अधिकार के/ग़ैर-क़ानूनी" बताया और निर्देश दिया कि इसे "तुरंत हटाया जाए"। लेकिन अभी तक फॉर्म 6 से इसे नहीं हटाया गया है।