
इन दिनों आप मुजफ्फरनगर के किसी भी ग्रामीण इलाके में जाएं, तो आपको लोग बीएलओ के बारे में पता करते या उन्हें घेरकर खड़े नजर आ जाएंगे। हर आदमी जोर आजमाइश कर रहा है कि एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) में उसका नाम न छूटे। इसे उत्साह न मानें, तो बेहतर है क्योंकि उनके लिए यह जीवन-मरण का सवाल हो गया है। थोड़ा घूमें-टहलें, तो आपको भी समझ में आ जाएगा कि क्यों।
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महानगरों और बड़े शहरों के लोगों ने तो कई किस्म के पहचान पत्र बनवा रखे होते हैं, पर मुजफ्फरनगर-जैसे शहर में भी जाएं, तो तुरंत समझ में आता है कि निम्न और निम्न मध्यवर्गीय परिवार एसआईआर को लेकर किन समस्याओं से जूझ रहे हैं।
हम जब वार्ड नंबर 50 के सभासद नौशाद खान के कमरे में पहुंचे, तो वहां बैठे हर पुरुष या महिला के चेहरे पर फैली चिंता की लकीरें साफ पढ़ी जा सकती थीं। वहां गज़ाला भी थीं, जो हैं तो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता लेकिन इन दिनों बीएलओ का दायित्व भी निभा रही हैं। वह उम्रदराज हैं। उनके पास फॉर्म का गट्ठर था। वह साथ में बैठी एक बुर्कानशीं महिलाओं की डिटेल नोट कर रही थीं। कई महिलाओं की शिकायत थी कि इंतजार करते हुए उन्हें काफी समय हो गया है, मगर गज़ाला उनकी डीटेल्स नहीं ले रही हैं। लोग उनसे इस बात की पुष्टि भी करने को कह रहे हैं कि क्या एसआईआर में लगने वाली लेडीज की फोटो में भी कान दिखना जरूरी है और नकाब और हिजाब से कान ढंके होंगे, तो फॉर्म कैंसिल हो जाएंगे? एक व्यक्ति ने तो मुझसे ही कहा कि उनकी बीवी की तस्वीर हिजाब में है और उन्हें डर है कि बीवी का फॉर्म रिजेक्ट हो सकता है।
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इंतिज़ार बताते हैं कि मुजफ्फरनगर सदर विधानसभा क्षेत्र के महावीर चौक से थोड़ी दूर खालापार में एक मोहल्ला कस्साबान है। वहां 2002-03 से छह सात सौ लोगों का वोट हैं ही नहीं। जब भी चुनाव आता है, उस इलाके के लोग शिकायत करते हैं कि हमारा वोट नहीं है। वोट बनाने की प्रक्रिया शुरू तो होती है, लेकिन वोट नहीं बनता है। इस समस्या का अब तक कोई समाधान नहीं हुआ है। पता नहीं, इस बार भी होगा या नहीं।
मुजफ्फरनगर में मिले आरिफ़ कहते हैं कि सबसे ज्यादा शिकायत इस बात की है कि फॉर्म नहीं मिला और बीएलओ फोन नहीं उठाते हैं। फिर, वह खुद ही कहते हैं कि बीएलओ फोन उठाए भी तो कैसे- उसके फोन की घंटी बजती रहती है। दूसरी समस्या यह कि फॉर्म भरा कैसे जाएगा? फॉर्म में चार कॉलम दे रखे हैं। 2003 वालों का अलग कॉलम है, 2003 के बाद वालों का अलग कॉलम है, 1987 से पहले वालों के लिए अलग कॉलम है। और इन कॉलम के चक्कर में लोगों को कन्फ्यूजन हो रहा है।
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इन दिक्कतों की वजहें भी हैं। महानगरों से लेकर गांवों तक में एक दिक्कत समान है। मान लें, किसी स्कूल में इलाके का वोटिंग सेंटर है। वहां चार बूथ हैं। ऐसे में, कई जगह एक घर में ही अलग-अलग बूथ के मतदाता हैं। सबके सेंटर एक हैं, पर बूथ अलग हैं, इसलिए सबके अलग-अलग बीएलओ हैं। अगर एक घर में पांच लोग हैं, लेकिन अब तक फॉर्म तीन ही लोगों के आए हैं, तो उसकी वजह यही है। इस कारण एक ही घर में दो या कभी-कभी तीन बीएलओ को जाना पड़ रहा है। वैसे भी, सूची में नाम क्रम से और एक ही जगह हों, यह जरूरी नहीं हो- हो सकता है, एक आदमी का नाम नंबर 88 पर हो, दूसरे का 105 और तीसरे का 107 पर। वोटर लिस्ट में एक ही मकान नंबर पर कई लोगों के रहने की बात दर्ज है जबकि उस नंबर पर रहने वाले लोग ही इस बात पर आश्चर्यचकित हो जाते हैं। 2003 वाले दस्तावेज देने में भी इसके साथ कई और तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं। उन इलाकों में ज्यादा समस्या है जहां परिसीमन की वजह से चुनाव क्षेत्र में बदलाव हो गया है। इससे अपने को टेक-फ्रेंडली मानने का दावा करने वाले लोगों को भी कई दफा अपने हथियार डाल देने पड़ रहे हैं। फिर, पिछले 20-22 सालों में कई लोगों के एपिक नंबर भी आयोग ने बदले हैं। जैसे, कई जगह इसकी शुरुआत यूपी से होती थी, अब एक्सपी या इसी किस्म के कोड से होती है। ऐसे में, अपना या अपने माता-पिता के एपिक नंबर के डीटेल खोजने में दिक्कत हो रही है।
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अब जैसे, जड़ौदा गांव से नौकरी करने रोजाना मुजफ्फरनगर आने वाले तंजीम कहते हैं कि उन्होंने कुछ लोगों के नाम या कोई डीटेल चेन्ज कराया या स्पेलिंग ठीक कराई, तब भी एपिक नंबर बदल गया। उनका कहना है कि पहले आम तौर पर लोग नाम बोलकर लिखवाते थे और इसमें अक्सर स्पेलिंग की गलतियां हो जाती थीं। ऐसे में, 2003 की वोटर लिस्ट में नाम की स्पेलिंग कुछ और है, और 2025 की वोटर लिस्ट में अलग।
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समाजवादी पार्टी से जुड़े शारिक खान भी बताते हैं कि पहले लोग उतने जागरूक नहीं थे। ऐसे में, एक व्यक्ति के दो नाम हुआ करते थे; जैसे, शारिक को लोग प्यार से सोनू भी कहा करते हैं। अब हुआ यह कि 2003 में वोटर लिस्ट में आपका नाम सोनू चढ़ गया और बाद में सारे पहचान पत्र शारिक के नाम से बने, तो अब यह कैसे साबित किया जाएगा कि सोनू ही शारिक है। वैसे, अब समय बदल चुका है, तो लोग भी सतर्क हैं। लेकिन पुराने दस्तावेज की अनिवार्यता का वे क्या करें?
इन्हीं वजहों से बीएलओ और प्राइमरी स्कूल टीचर गोपाल शर्मा बताते हैं कि 2003 की वोटर लिस्ट से भाग संख्या, क्रम संख्या भरने में लोग गलती कर रहे हैं। वह कहते हैं कि लोगों को सिर्फ डीटेल भरने में ही नहीं, बल्कि ढूंढ़ने में भी परेशानी आ रही है। जीटी रोड से चलने पर लाल मोहम्मद मोहल्ले की पुलिया पर बैठे इंतिज़ार ने शिकायत भी कि बहुत सारे फॉर्म ही गलत निकल जा रहे हैं। किसी में नाम गलत हो रहा है, किसी में एड्रेस गलत हो जा रहा है। कहीं आधार में कुछ डाटा है, तो फॉर्म में कुछ और लिखा है। ऐसी गलतियों की वजह से बहुत सारे लोगों के फॉर्म रिजेक्ट हो रहे हैं।
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बीएलओ की दिक्कतें और चिंताएं दूसरी भी हैं। शहरों की सोसाइटी में तो आरडब्ल्यूओ-जैसे संगठन सक्रिय हैं, इसलिए बीएलओ कहीं एक जगह बैठकर यह काम कर पा रहे हैं। लेकिन गांवों, शहरों और महानगरों के मुहल्लों में काम कर रहे बीएलओ को हर घर का दरवाजा कम-से-कम दो बार सचमुच खटखटाना पड़ रहा है। अगर कोई न मिला और उसने फॉर्म ले लिया है, तो बीएलओ को कम-से-कम और एक बार तो वहां जाना ही होगा। जरूरी नहीं कि इन बीएलओ के साथ आदमी, मतलब मतदाता अच्छा और सामान्य व्यवहार ही करे। फिर, इन सब पर फॉर्म जल्द-से-जल्द भरवाने, फॉर्म सही तरीके से भरवाने, भरे गए फॉर्म जल्द-से-जल्द जमा करवाने का
दायित्व है। यह उनके सामान्य कामकाज से अलग है क्योंकि वे कहीं-न-कहीं सरकारी विभाग में काम कर रहे हैं, जहां उन्हें अपनी उपस्थिति पहले दर्ज कराना लगभग जरूरी है। पहले वोटर लिस्ट रिवीजन के काम थोड़े लंबे समय तक चलते थे, तो मतदाता समय के साथ अपने दस्तावेज उपलब्ध करा देता था और बीएलओ भी यह काम सुकून से करते थे। इस बार बीएलओ सुबह 8 बजे से रात 10 बजे तक काम कर रहे हैं, चूंकि समय कम है।
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वैसे, बीएलओ आम तौर पर उसी इलाके का, बल्कि उसी वार्ड का व्यक्ति होता है, जहां उसे रिवीजन करना है, इसलिए लोगों को लगता है कि वह उनके साथ नाइंसाफी नहीं होने देगा। शायद इसी वजह से लाल मोहम्मद मोहल्ले में मिले 70 वर्षीय मोहम्मद इकबाल यह शिकायत तो करते हैं कि आठ दिन से फॉर्म लेकर घूम रहा हूं, लेकिन जमा नहीं हो पा रहा है, पर यह जोड़ना नहीं भूलते कि बीएलओ गलत आदमी नहीं है, उसके पास भीड़ बहुत हो रही है। उसके पास काम बहुत ज्यादा है, इसलिए वह कह रहे हैं कि कल आना, परसों आना..।
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कई किस्म के लोग इस अभियान में लगे हुए भी हैं। जैसे, नगरपालिका के चेयरमैन के कहने पर 12वीं पास शमशाद अंसारी बीएलओ की मदद में लगे हुए हैं। वह वार्ड 17 और वार्ड 60 में 200 से ज्यादा फॉर्म भरवा चुके हैं। शमशाद कहते हैं कि समय ऐसा है कि एक-दूसरे के साथ खड़ा होने की जरूरत है। ऐसा काम पहले नहीं हुआ था, ऐसा फॉर्म पहली बार भरवाया जा रहा है। वह कहते हैं कि डरने की जरूरत नहीं है। जिनका नाम 2003 की लिस्ट में नहीं है, उनका 2024 की लिस्ट में होगा; वहां उनका नहीं होगा, तो उनके माता-पिता का होगा; परिवार के किसी-न-किसी व्यक्ति का तो होगा ही। नाम सिर्फ मृतकों, डुप्लिकेट और पलायन कर चुके लोगों का कटेगा।
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जीटी रोड पर मिले आताभ कहते हैं कि मुसलमानों की बड़ी संख्या एसआईआर पर ऐसे टूट पड़ी है, मानो उनका कुछ खो गया हो या जिसके खो देने का उन्हें डर हो। लोग इस काम के लिए सारे दिन इधर-उधर भटक रहे हैं और अगर बीएलओ किसी के पास जा नहीं रहे, तो लोग उनके पास भागे-भागे आ रहे हैं। आताभ कहते हैं कि मुसलमानों को डर है कि उनका नाम वोटर लिस्ट से कट जाएगा। आताभ की शंका बेवजह भी नहीं है। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह का एक वीडियो वायरल है जिसमें वह यह कहते देखे-सुने जा सकते हैं कि एसआईआर के बाद बनी मतदाता सूची में नाम शामिल न होने पर संदिग्ध लोगों को डिटेक्ट किया जएगा, उन्हें डिटेंशन सेंटर में डाल दिया जाएगा और फिर, डिपोर्ट कर दिया जाएगा। लगभग सभी लोगों के माबाइल में यह
वीडियो है, हालांकि यह वीडियो रीयल है या फेक, इस बारे में उन्हें भी नहीं मालूम। इसी तरह कई अखबारों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सभी जिला प्रशासन को दिया यह निर्देश छपा है कि वे विदेशी होने के संदिग्ध लोगों को डिटेन्शन सेंटर में डालने की तैयारी कर लें। कुछ उत्साही अखबार वाले तो ऐसे सेंटरों का खाका भी छाप चुके हैं!
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अपने नेताओं के इस किस्म के बयानों की वजह से ही बीजेपी के लोगों को लगता है कि इसका राजनीतिक लाभ उनकी पार्टी को मिलेगा। लाल मोहम्मद मोहल्ले में में मिले भाजपा के खतौली उपाध्यक्ष भरतेश शर्मा ने कहा भी कि पार्टी की तरफ से मैसेज है कि जितनी जल्दी हो सके, सबका एसआईआर कराया जाए। वह कहते हैं कि बड़ा प्रदेश होने की वजह से कम-से-कम 1 करोड़ वोट तो कटेंगे ही। लेकिन भारतीय किसान यूनियन के नगर अध्यक्ष रिजवान कुरैशी ठेकेदार आरोप लगाते हैं कि बहुत सारे लोगों के नाम नहीं आ रहे हैं। वोट काटे जा रहे हैं। इस सरकार का इरादा वोट के अधिकार को खत्म करने का है। वोट खत्म हो गया तो बचेगा क्या?
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लेकिन आरिफ़ कहते हैं कि एक वर्ग ठीक ही परेशान है, लेकिन इस किस्म के बयान महज राजनीतिक लाभ के लिए हैं। मुसलमान इस देश के नागरिक हैं और उनलोगों ने हर मोर्चे पर खुद को साबित किया है। वैसे, सभासद नौशाद खान कहते हैं कि हिन्दू हों या मुसलमान- मृत, डबलिंग (डुप्लिकेट) या पलायन कर गए 5 से 10 प्रतिशत लोगों के नाम वोटर लिस्ट से तो कटेंगे ही। यह नॉर्मल बात है। वैसे, नौशाद को चुनाव आयोग की यह बात भी सच लगती है कि जिनके नाम कट जाएंगे, उन्हें अगले माह नोटिस आएगा।
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