विचार

काम का अंबार, पक्की नौकरियों का अकाल

क्या भारत का श्रम बाजार उस भविष्य के लिए तैयार है जहां प्रोजेक्ट और प्लेटफॉर्म तो होंगे, पर सामाजिक सुरक्षा वाली पक्की नौकरियां सिमटती जाएंगी?

Getty Images
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बेशक नीट पर्चा लीक मामले ने हालिया छात्र आंदोलन को हवा दी हो, लेकिन यह मानना बड़ी भूल होगी कि प्रदर्शन केवल परीक्षाओं के कुप्रबंधन के खिलाफ था। प्रदर्शनों में झलकता गुस्सा गहरी आशंका से उपजा है। करोड़ों युवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं सुरक्षित-सम्मानजनक वेतन वाली नौकरी पाने के चंद जरियों में एक हैं। ऐसे में, जब इन परीक्षाओं की निष्पक्षता से समझौता होता है, तो सीधा मतलब होता है- दोबारा प्रयास करने के लिए पूरे साल का इंतजार। इसलिए, शुरू से ही यह आंदोलन जितना परीक्षाओं को लेकर था, उतना ही नौकरियों के लिए भी।

सरकारी प्रतियोगी परीक्षाएं स्नातकों के लिए ऐसा ‘वेटिंग रूम’ बन चुकी हैं जहां जीवन ठहर जाता है। 20-22 साल के युवा उन परीक्षाओं को पास करने की बार-बार कोशिश में, जहां सफलता दर महज 1-2 फीसद होती है, कोचिंग संस्थानों और किराये के कमरों में सालों खपा देते हैं। ये उनके जीवन के वे सबसे कीमती साल होते हैं जिनमें वे काम का अनुभव, व्यावहारिक कौशल और पेशेवर संपर्क हासिल कर सकते थे।

युवाओं का यह लंबा इंतजार बेवजह नहीं, क्योंकि निजी क्षेत्र में शुरुआती स्तर के वेतन लंबे समय से ठिठके हैं। एक युवा पुरुष स्नातक की औसत मासिक कमाई 2011 के 21,800 रुपये से घटकर 2023 में 19,573 रुपये रह गई और यह गिरावट तो महंगाई दर के समायोजन से पहले की है। इसके उलट, सरकारी नौकरी कहीं बेहतर वेतन, निरंतरता, स्वास्थ्य लाभ, सामाजिक प्रतिष्ठा और नौकरी छूटने से सुरक्षा देती है। व्यक्तिगत स्तर पर देखें तो इंतजार का यह फैसला तर्कसंगत लगता है, लेकिन सामूहिक स्तर पर इसका परिणाम मानव क्षमता की भारी बर्बादी है।

वर्ष 2004 से 2023 के बीच, भारत ने हर साल औसतन 50 लाख स्नातक तैयार किए, लेकिन स्नातकों के लिए रोजगार में सालाना केवल 28 लाख का ही इजाफा हो सका। इनमें भी नियमित वेतन वाली नौकरियां की संख्या और कम थी। नतीजतन, करोड़ों युवा या तो बेरोजगार हैं, या अपनी योग्यता से कमतर काम कर रहे हैं, या किसी दुर्लभ सरकारी नौकरी की उम्मीद में ‘वेटिंग रूम’ में बैठे हैं।

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण ने 2025 में समग्र बेरोजगारी दर 3.1 फीसद और युवा बेरोजगारी दर 9.9 फीसद दर्ज की। लेकिन ‘सामान्य स्थिति’ का मापक किसी व्यक्ति को तब भी ‘रोजगारयुक्त’ मान लेता है जब उसने बीते एक साल में महज 30 दिन कोई छोटी-मोटे आर्थिक गतिविधि की हो। इस तरह पारिवारिक खेत में कभी-कभार हाथ बटाने वाला, डिलीवरी का छिटपुट काम करने वाला या स्वरोजगार से बेहद मामूली आय अर्जित करने वाला व्यक्ति भी आंकड़ों में ‘रोजगारयुक्त’ माना जाता है। 

यही वजह है कि रोजगार पर बहस को केवल ‘रोजगारयुक्त’ और ‘बेरोजगार’ के सपाट विभाजन से आगे ले जाना होगा। अल्प-रोजगार, परोक्ष बेरोजगारी, काम के अनिश्चित घंटे, कम मजदूरी, अनुबंध पत्र का न होना और सामाजिक सुरक्षा का अभाव भी उतने ही महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

मानव पूंजी के अधूरे इस्तेमाल की सबसे साफ तस्वीर कृषि क्षेत्र में दिखती है। रोजगार में इसकी हिस्सेदारी, जो कई दशकों से घट रही थी, 2017-18 के 44.1 फीसद से बढ़कर 2023-24 में 46.1 फीसद हो गई। यह उलटफेर महामारी के दौर में हुए पलायन के साथ विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों की उस विफलता को भी दिखाता है जिसके कारण वे श्रमिकों को पर्याप्त संख्या में खपा नहीं सके। कृषि क्षेत्र राष्ट्रीय उत्पादन में केवल छठे हिस्से का योगदान देता है, लेकिन वर्कफोर्स के दो-पांचवें से अधिक हिस्से का बोझ उठाता है। पारिवारिक खेत अक्सर अंतिम विकल्प होते हैं। ताजा पीएलएफएस आंकड़े इसमें मामूली गिरावट दिखाते हैं, लेकिन यह मापन की कार्यप्रणाली में आए बदलाव का नतीजा भी हो सकता है।

मजदूरी की स्थिति और साफ तस्वीर पेश करती है। पुरुष अकुशल दैनिक श्रमिकों की औसत दिहाड़ी 2024 के 456 रुपये की तुलना में 2025 में व्यावहारिक रूप से 455 रुपये पर टिकी रही। महिला दैनिक श्रमिकों की कमाई 299 रुपये से बढ़कर 315 रुपये हुई। ये महज नाममात्र के आंकड़े हैं, जिनमें जीवन-यापन की लागत में हुई बढ़ोतरी को शामिल नहीं किया गया है।

प्लेटफॉर्म आधारित काम (गिग वर्क) के विस्तार को इसी पृष्ठभूमि में देखना चाहिए। हाल ही में एक प्रमोशनल विज्ञापन में घरेलू काम के लिए 29 रुपये प्रति घंटे की पेशकश की गई। यह ग्राहक को दी गई रियायती दर थी, न कि उस कामगार को मिलने वाली मजदूरी। एक प्रमुख डिजिटल समाचार पत्र द्वारा साक्षात्कार किए गए कामगारों ने माना कि उनकी मासिक कमाई पारंपरिक घरेलू काम की तुलना में बेहतर है। लेकिन इसके साथ ही इसने छुट्टियों पर सख्त पाबंदियों, जुर्माने, अनिश्चित ब्रेक, लंबे कार्य-दिवस और ऐप के जरिये चौबीस घंटे निगरानी की कड़वी सच्चाई को भी उजागर किया। कामगारों का कहना था कि वे आपात स्थिति में भी छुट्टी नहीं ले सकते और न ही समय पर खाना खा सकते हैं।

प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था एक उपयोगी आर्थिक भूमिका निभाती है। यह खोज लागत घटाती है, ग्राहकों और कामगारों को तेजी से जोड़ती है, नई सेवाएं पैदा करती है और अनौपचारिक श्रम बाजार में कुछ हद तक पारदर्शिता लाती है। इसलिए नीतिगत प्रतिक्रिया गिग अर्थव्यवस्था के रास्ते में रोड़े अटकाने की नहीं होनी चाहिए। लेकिन कामगारों को केवल ‘पार्टनर’ कह देने से जवाबदेही पूरी नहीं हो जाती-खासकर तब जब प्लेटफॉर्म ही ग्राहकों तक पहुंच, काम के घंटे, रेटिंग, पेनल्टी और काम की पात्रता तय करता हो।

असुरक्षा की यह स्थिति अब उन पेशों में भी दिख रही है जिन्हें कभी सुरक्षित मानते थे। आईटी क्षेत्र में बेंच पीरियड घटाकर, परफॉर्मेंस इम्प्रूवमेंट प्लान, कौशल-आधारित छंटनी और ‘इस्तीफे के प्रोत्साहन’ के जरिये नौकरियां छीनी जा रही हैं। वहीं दूसरी ओर, एआई के दुर्लभ कौशल वाले शोधकर्ताओं और इंजीनियरों को असाधारण वेतन और स्टॉक विकल्प मिल रहे हैं। श्रम बाजार असमान होता जा रहा है: तकनीक के नए क्षितिज पर असीमित इनाम हैं, तो दूसरी तरफ रूटीन कोडिंग, टेस्टिंग और बैक-ऑफिस के काम में भारी अनिश्चितता।

साफ संकेत है कि भारत को ऐसे भविष्य के लिए तैयार होना होगा जहां काम तो बहुत हो सकता है, लेकिन पारंपरिक नौकरियां कम रहेंगी। पारंपरिक रूप से नौकरी का मतलब था-एक ही नियोक्ता के साथ लंबा रिश्ता, तय वेतन, काम के निश्चित घंटे और कुछ हद तक सामाजिक सुरक्षा। भविष्य में काम का ढांचा तेजी से प्रोजेक्ट्स, असाइनमेंट्स, प्लेटफॉर्म्स और कई तरह के अल्पकालिक करारों के रूप में आएगा। गिग वर्कर कोई छोटा वर्ग नहीं रहा। कार्यबल के बड़े हिस्से के लिए काम की यही लचीली व्यवस्था आम बात हो गई है। 

ऐसी लचीली व्यवस्था से देखभाल की जिम्मेदारी उठाने वाली महिलाओं, बुजुर्गों, प्रवासियों और कुशल पेशेवरों को उनकी परिस्थितियों के अनुकूल काम करने का मौका मिल सकता है। यह उद्यमिता को बढ़ावा देगी। लेकिन एक उचित नीतिगत ढांचे के बिना, नियोक्ता के लिए जो ‘लचीलापन’ है, वह कामगार के लिए भारी ‘असुरक्षा’ बन सकता है।

इसलिए भारत को एक साथ दो काम करने होंगे: पहला, ऐसा माहौल जहां गिग और प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था फले-फूले; और दूसरा, ऐसा कानूनी ढांचा जो इस काम को ‘सम्मानजनक’ बनाए। सामाजिक सुरक्षा के लाभ ऐसे हों कि नियोक्ता या प्लेटफॉर्म बदलने पर भी कामगार वह लाभ आसानी से साथ ले जा सके। प्लेटफॉर्म्स को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पारिश्रमिक, रेटिंग, काम का आवंटन और आईडी निष्क्रिय करने के फैसले किन आधार पर लिए जाते हैं। कामगारों के लिए आसान शिकायत निवारण तंत्र, समय पर भुगतान और मनमाने निष्कासन से सुरक्षा जरूरी है। कानून को काम के वास्तविक लचीलेपन को बनाए रखना चाहिए, लेकिन ‘पार्टनरशिप’ जैसी शब्दावली के आड़ में नियोक्ता को उसकी बुनियादी जिम्मेदारियों से भागने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए।

इसी संदर्भ में, ‘प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था में सम्मानजनक काम’ पर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के सम्मेलन से भारत का दूरी बनाना अच्छा संकेत नहीं। संगठन का कन्वेंशन नंबर 193 ऐप-आधारित और डिजिटल प्लेटफॉर्म कार्य को लक्षित करने वाली दुनिया की पहली कानूनन बाध्यकारी संधि है। खबरों के मुताबिक, भारतीय कामगारों और नियोक्ता प्रतिनिधियों ने संधि का समर्थन किया, जबकि सरकारी प्रतिनिधि ने मतदान से दूरी बना ली। सरकार का यह रुख चिंता पैदा करता है, क्योंकि भारत का घरेलू गिग बल तेजी से बढ़ रहा है, फिर भी एल्गोरिदम की पारदर्शिता और कामगारों के पुनर्वर्गीकरण पर बाध्यकारी वैश्विक मानकों को अपनाने में हिचकिचाहट दिख रही है।

भारत को निस्संदेह अधिक से अधिक रोजगार की जरूरत है। नीतिगत चुनौती कामगारों के हितों की रक्षा की है-यह सुनिश्चित करने की कि असाइनमेंट, कॉन्ट्रैक्ट और प्लेटफॉर्म पर आश्रित होता जा रहा श्रम बाजार कामगारों को आय की सुरक्षा, मोलभाव की ताकत और सामाजिक संरक्षण से वंचित न कर दे। वरना, सरकारी नौकरियों का यह ‘वेटिंग रूम’ ऐसे ही भरता रहेगा।

-अजीत रानाडे प्रख्यात अर्थशास्त्री हैं। साभार: द बिलियन प्रेस