विचार

धान का मौसम है, मेहमान का मौसम है

कभी भादों में चिरई-चिरंगुल तक 'उपवास' करते थे, क्योंकि चैत में पैदा हुआ अनाज भादों तक खत्म हो जाता था और कुआर का महीना महीने भर दूर होता था। लेकिन भादों को कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिए कि वह परम संतोषी है।

धान का मौसम है, मेहमान का मौसम है
धान का मौसम है, मेहमान का मौसम है फोटो- साभार

जब आप ये पंक्तियां पढ़ रहे हैं तो सावन हमारे बीच से जा चुका है और भादों ने दस्तक दे दी है। लेकिन महाकवि कालिदास के महाकाव्य 'रघुवंशम' के मंगलाचरण के पहले श्लोक के शब्दों में कहें तो दोनों इस तरह 'वागर्थाविव संपृक्तौ' (शब्द और अर्थ की तरह घुले-मिले) हैं कि उन्हें अलग करके देखना मुमकिन ही नहीं।

गीतकार आनंद बख्शी के लिखे और लता मंगेशकर के गाए ‘महबूबा’ फिल्म के गीत 'मेरे नैना सावन-भादों, फिर भी मेरा मन प्यासा!' में ही नहीं, अनेक दूसरे गीतों में भी मन की प्यास से विकल नायिकाएं नीर भरे नैनों से तड़प का इजहार करती हैं तो सावन-भादों को एक ही नजर से देखती हैं।

हिन्दी कवि आलोक धन्वा तो सबसे काली रातों, सबसे काले मेघों और सबसे तेज बौछारों का सारा क्रेडिट सावन के बजाय भादों को ही देते हैं। अपनी ‘पतंग’ कविता में वह लिखते हैं कि भादों मस्तूलों को झुकाती, नगाड़ों को गुंजाती, डंका पीटती, कुओं और तालाबों को झुलाती और साथ ही लालटेनों एवं मोमबत्तियों को बुझाती आती अपनी सबसे तेज बौछारों के साथ आता है और उन्हीं के साथ चला जाता है।

परम संतोषी भादों

दादी बताती थीं कि कभी भादों में चिरई-चिरंगुल तक 'उपवास' करते थे, क्योंकि चैत में पैदा हुआ अनाज भादों तक खत्म हो जाता था और कुआर का महीना महीने भर दूर होता था। लेकिन भादों को कोई फर्क नहीं पड़ता। क्यों भला? हम पूछते तो दादी बतातीं : परम संतोषी है वह। इतने भर से संतुष्ट रह लेता है कि उसका नाम कुछ ऐसे लिया जाता है जैसे वह सावन का जुड़वा भाई हो।

भादों का स्वभाव अभी भी नहीं बदला है। निर्दंभ ही है वह। सावन मेघमालाओं के साथ भीगते-भगोते आता है तो ढेर सारी उमंगें उनके नाम कर दी जाती हैं, लेकिन भादों में शुभ कार्य की इजाजत नहीं होती, क्योंकि सारे शुभ कार्यों के साक्षी माने जाने वाले विष्णु के बारे में मान्यता है कि भादों लगते ही वह शयन करने पाताल लोक चले जाते हैं।

भादों छठा और चातुर्मास का दूसरा मास है और उसकी पूर्णिमा पर आकाश में पूर्वा या उत्तरा भाद्रपद नक्षत्रों का जो योग बनता है, उसके कारण उसका एक नाम भाद्रपद भी है। भगवान श्रीकृष्ण, उनकी आह्लादिनी राधा और बड़े भाई बलराम का जन्म भी उसी की धूप या छाया में हुआ है। उसके अंधेरे पाख की वह अष्टमी आती है- जब अपने भाई कंस के अत्याचार सहने को अभिशप्त और पति वसुदेव के साथ कारागार में बंद देवकी ने योगेश्वर कृष्ण को जन्म दिया और वसुदेव ने उन्हें कंस के हाथों से बचाने के लिए उफनाई यमुना पार कर गोकुल पहुंचाया- तो वह भरपूर उल्लसित होता है।

कवि-शायरों ने न तीन में गिना, न तेरह में

हरियाली तीज, हरितालिका तीज, कजली तीज, गणेश चतुर्थी, कलंक चतुर्थी, हेरम्ब संकष्टी, ऋषि पंचमी, बुला या कि बहुला चौथ, डोला ग्यारस और अनंत चतुर्दशी सब के सब इस भादों की ही अमानत हैं, जिनमें कोई महिलाओं के सौभाग्य का व्रत है, कोई अनंत पुण्य प्राप्त करने का, कोई भगवान कृष्ण और उनकी गायों के पूजन का तो कोई संतान कामना का। उज्जैन में, जहां द्वादश ज्योतिर्लिंगों में तीसरा महाकालेश्वर ज्योर्तिलिंग स्थित है, भादों के पहले दो सोमवारों को भगवान महाकाल की सवारी निकालने की परंपरा भी उसका गौरव बढ़ाती ही है। 

फिर भी अनेक कवि और शायर उसे न तीन में गिनते हैं, न तेरह में। उलटे उसकी रातों को अपनी कोमलगात नायिकाओं के लिए नागिन तक बना डालते हैं। लोकगायक और गायिकाएं तो यह तोहमत लगाने से भी बाज नहीं आते कि सावन बीत गया, भादों में गौरा पल-पल सूखी जाए। 

ठीक है कि भादों की रातें काली भी होती हैं और अंधेरी भी, मगर काली तो नायिकाओं की लटें या जुल्फें भी होती हैं। वे नागिन सी लहराती हैं तो कविगण नायकों को उनसे डराते नहीं, उन्हें निहारने को ललचाते हैं, लेकिन भादों की रातों को लेकर डर का ऐसा तूमार बांधते हैं जैसे वे मौका पाते ही नायिकाओं को सचमुच काट खाएंगी। इसलिए उनकी नायिकाएं भले ही देश-दुनिया और अपने अंदर-बाहर का ढेर सारा अंधेरा बिना उफ किए झेल लेती हैं, भादों की रातों का रोना रोती कतई नहीं थकतीं।

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जायसी ने भादों के साथ थोड़ा इंसाफ किया

मैथिल कोकिल विद्यापति तक शिकायत करते हैं कि उनकी नायिका भादों की रातों की हाथ पसारे न सूझने वाली अन्हियरिया में बार-बार चिहुंक उठती है। चिहुंक उठती होगी भाई, विरहिणी हुई तो कलपती भी होगी। मगर पिया उसके पास हुए तो चिहुंककर उनके अंक में भी तो समा जाती होगी। उस समा जाने का थोड़ा बहुत क्रेडिट भादों को देना चाहिए या नहीं?

महेन्दर मिसिर की यौवन के मद में माती नायिका अपने पिया को भरे भादों परदेस जाने को उद्यत देखकर सारी लाज-शरम बिसराकर यों ही तो नहीं कह देती कि वह चले गये और अकेली वह अपनी चढ़ी हुई जवानी को संभाल नहीं पाई, कुछ ऊंच-नीच कर बैठी तो वही जानें: अंगना में कीच-काच, दुअरा पै पानी, खाला-ऊंचा गोड़ पड़ी चढ़ल बा जवानी, केकरा पै छोड़ि जाल्या टुटही पलानी, केकरा से आगि मांगब, केकरा से पानी? एतना बता के जइहा, कइसे दिन बीती राम।

मलिक मुहम्मद जायसी ने जरूर भादों के साथ थोड़ा इंसाफ किया है। यह लिखकर कि कोई बाला अपने कंत के साथ हो तो उसके लिए क्या सावन और क्या भादों! आकाश में बिजली चमकती है तो उसे लगता है धरती पर सोना बरस रहा है। मेघ चमककर गरजते हैं तो वह चौंककर कंत को बांहों में भर लेती है। मलय समीर की सुगंध के बीच खिले हुए बेले के फूलों से उसकी सुख-सेज सजाई जाती है तो उसे सारा संसार हरा-हरा दिखाई पड़ने लगता है। फिर तो वह कुसुम्भी चोला पहनती और कंत के संग हिंडोला सजा लेती है। निस्संदेह, कंत नहीं होते, तो जायसी की विरहिणी नागमती को भी भादों ‘दूभर’ और ‘अति भारी’ लगने लगता है। वह व्याकुल होकर पूछने लग जाती है कि कइसे भरों रैन अंधियारी यानी यह अंधियारी रात कैसे बिताऊं?

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सारी तोहमतें भादों के सिर

लेकिन सोचिए जरा कि इसमें भादों की भला क्या खता? नागमती को जो सता रहा है, वह तो रत्नसेन का वियोग है। उस वियोग के ही कारण उसकी सेज तक नागिन बनकर उसे डसने पर आमादा है और वह उसकी एक पाटी पकड़े रात गुजारने को अभिशप्त है। कभी उसकी आंखें फटने को तो कभी कलेजा मुंह को आ जाता है। लगता है कि बिजली बार-बार चमक कर एलान कर रही है कि विरहकाल उसके प्राण लेकर ही मानेगा। 

फिर तो वह आक (मदार) और जवास की तरह सूख जाती और कलपती हुई कहने लगती है: बरसै मघा झकोरि झकोरी। मोर दुइ नैन चुवैं जस ओरी। उसकी इस हालत से पूरी सहृदयता बरतते हुए भी कहना होगा कि उसका ठीकरा भादों पर फोड़ना वैसे ही है जैसे एक शायर ने कहा है कि पूछिए यों तो सरासर है कुसूर आंखों का, दिल तो बस मुफ्त में बदनाम किया जाता है। इसका क्या तुक कि सारा कुसूर रत्नसेन के वियोग का और सारी तोहमतें भादों के सिर। 

मुल्ला दाऊद के रचे हिन्दी के पहले ज्ञात सूफी प्रेमकाव्य ‘चंदायन’ के एक ‘कड़वक’ में उपनायिका मैना भी भादों को नहीं ही बख्शती। कहती है कि भादौं की अंधेरी रातें डरावनी भी थीं और क्रूर भी, जबकि मैं बालिका। न कोई सखी थी, न सहेली। बिजली चमकती थी तो मुझ अकेली का हृदय फट जाता था- आंखें जैसे फूटकर बह निकलने और धरती और सागरों को भरने को आतुर हो उठती थीं।

ऐसे में, लब्धप्रतिष्ठ कवि और गीतकार डॉ. ओम निश्चल को शुक्रिया कहने का मन होता है कि उन्होंने अपनी एक कविता में भादों का भरपूर खयाल रखा है : पांवों से कहो थिरकें/ हैं कह रही फिजाएं/यह धान का मौसम है/....सावन अभी गया है/भादों का मन नया है/ पत्तों में ताजगी है/तन-मन भिगो गया है।/आने लगे हैं पाहुन/ मेहमान का मौसम है।

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