
हमारे देश में गर्भावस्था में या प्रसव के दौरान ही प्रति 1000 जन्म में से लगभग 18 शिशु मृत ही पैदा होते हैं। यदि, प्रसव के बाद शिशु जिंदा रहे तो इनमें से 24 शिशु जन्म के 1 वर्ष के भीतर ही मर जाते हैं। वर्ष 2026 में प्रकाशित आधार वर्ष 2024 की सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एस आर एस) रिपोर्ट इस श्रंखला में सबसे नई रिपोर्ट है, इसके अनुसार देश में प्रति एक हजार शिशुओं के जन्म में से 24 शिशु अपने जीवन का एक वर्ष भी पूरा नहीं कर पाते हैं। शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 17 है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के लिए यही आंकड़ा 27 का है।
इन आंकड़ों से इतना तो स्पष्ट है कि सरकार के तमाम दावों के बाद भी सामाजिक सरोकारों में ग्रामीण क्षेत्र लगातार पिछड़ रहे हैं। बीजेपी शासित और लगातार सबसे अधिक विकसित होने का दावा करने वाले उत्तर प्रदेश में प्रति एक हजार जन्म में से 35 शिशु अपने जीवन का एक वर्ष भी पूरा नहीं करते, मध्य प्रदेश की भी यही स्थिति है। छत्तीसगढ़ में यह संख्या 36 की है। दूसरी तरफ केरल में प्रति एक हजार जन्म में से केवल 8 शिशुओं की मृत्यु एक वर्ष के भीतर होती है, पूरी तरह उपेक्षित और हिंसा के तांडव से घिरा मणिपुर इस मामले में बहुत आगे है– वहां प्रति एक हजार जन्म पर एक वर्ष के भीतर महज 2 शिशुओं की मृत्यु होती है।
एस आर एस 2024 के अनुसार प्रति एक हजार बालकों के जन्म में से 24 बालक एक वर्ष से पहले ही दुनिया छोड़ देते हैं, जबकि बालिकाओं में यह दर 25 की है। शहरी क्षेत्रों में बालक और बालिकाओं के आंकड़े क्रमशः 17 और 16 हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यही आंकड़े क्रमशः 27 और 28 हैं। इससे इतना तो स्पष्ट है कि शहरी क्षेत्रों में एक वर्ष भी पूरा जीवन व्यतीत नहीं कर पाने वालों में बालक अधिक हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यही स्थिति बालिकाओं की है। एस आर एस 2023 के अनुसार प्रति एक हजार जन्म में 25 शिशु एक वर्ष के भीतर दुनिया छोड़ देते हैं, जबकि एस आर एस 2022 में यह संख्या 26 बताई गई थी।
एस आर एस 2024 के अनुसार, वर्ष 1971 में शिशु मृत्यु दर 129 थी और वर्ष 2024 तक यह दर लगभग 20 प्रतिशत, यानि 24, ही रह गई। यही नहीं वर्ष 2014 में यह संख्या 39 थी, जिसमें 10 वर्षों के भीतर 38 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसे मोदी सरकार की एक महान उपलबद्धि के तौर पर दिखाया गया है, पर यूनिसेफ की वर्ष 2024 की एक रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक स्तर पर इस मामले में हम कहां खड़े हैं। यह रिपोर्ट नीयोनैटल डेथ के बारे में है, यानि इसमें प्रति एक हजार जन्म से एक महीने के भीतर होने वाली मृत्यु के आंकड़े दिए गए हैं।
भारत के लिए यह दर 16.7 है, यह दर किसी भी बड़े अर्थव्यवस्था और यहां तक कि अधिकतर विकासशील देशों से भी अधिक है। रूस में यह दर 2, ऑस्ट्रेलिया में 2.3, कनाडा में 3.4, अमेरिका में 3.7, मेक्सिको में 8.2, ब्राजील में 7.1, अर्जेन्टीना में 5.1, फ़्रांस में 2.8, यूनाइटेड किंगडम में 3 और सऊदी अरब में यह दर 2.9 है। यहां तक कि लगातार युद्ध की विभीषिका झेल रहे यूक्रेन में भी यह दर 4.5, ईरान में 7.2 और फिलिस्तीन में 8.9 है। भारत के पड़ोसी देशों में यह दर चीन में 2.6, श्रीलंका में 4, नेपाल में 15.3, बांग्लादेश में 17.9, म्यांमार में 19.6, पाकिस्तान में 36 और अफगानिस्तान में 33 है।
यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में पूरी दुनिया में 5 वर्ष तक की उम्र के 49 लाख शिशुओं की मौत दर्ज की गई और 21 लाख बच्चे किशोरावस्था तक पहुंचने से पहले ही दुनिया छोड़ गए। इसमें से अधिकतर बच्चे भारत समेत दक्षिण एशिया और सब-सहारा अफ्रीका के थे। इनमें से अधिकतर मौतों का कारण समय से पहले पैदा होना, प्रसव की परेशानी और गर्भ में संक्रमण है। एक से पांच वर्ष के बीच की उम्र में न्यूमोनिया, डायरिया और मलेरिया के कारण भी बहुत मौतें होती हैं। इस दौर में कुपोषण भी मृत्यु का एक बड़ा कारण है।
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लोकसभा में 12 दिसम्बर 2025 को प्रश्न संख्या 2224 के उत्तर में सरकार ने एस आर एस 2021-23 के आंकड़ों के अनुसार देश में जन्म से एक वर्ष पूरा होने के बीच प्रति हजार जन्म में 19 शिशुओं की मौत को स्वीकार किया था, जबकि 29 बच्चे अपनी जिंदगी के पांच वर्ष भी पूरे नहीं कर पाते। कुछ राज्यों की स्थिति इस मामले में राष्ट्रीय औसत, 19, की तुलना में बहुत खराब है। एक वर्ष से कम उम्र में मौत की दर असम, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में क्रमशः 21, 26, 27, 20, 21, 21 और 26 है। इसी तरह 5 वर्ष से कम उम्र में मौत का आंकड़ा इन राज्यों में क्रमशः 33, 41, 44, 32, 35, 34 और 42 है। हरियाणा में भी 5 वर्ष से कम उम्र में मृत्यु की दर 40 है।
लोकसभा में 17 दिसम्बर 2021 को प्रश्न संख्या 3258 के उत्तर में सरकार ने शिशु मृत्यु दर के वर्ष 2010 से 2019 तक के आंकड़े प्रस्तुत किए थे। वर्ष 2010 में यह दर 47 थी, जो वर्ष 2013 तक 40 रह गई– यानि 4 वर्षों के भीतर 7 अंकों की कमी आई। संख्या में गिरावट के संदर्भ में यह औसतन लगभग 2 प्रतिवर्ष रहा– इस दौर में डॉ मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री रहे। इसके बाद बड़बोले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विकसित भारत का दौर आया और वर्ष 2014 से 2019 के बीच शिशु मृत्यु दर में गिरावट औसतन 1.5 अंक प्रतिवर्ष ही रह गई।
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इसके बाद राज्यसभा में 12 मार्च 2025 को प्रश्न संख्या 1587 के उत्तर में फिर से शिशु मृत्यु दर के कुछ वर्षों के आंकड़े प्रस्तुत किए गए। इन वर्षों में वर्ष 2016 से वर्ष 2019 के आंकड़े लोक सभा में 17 दिसम्बर 2021 को भी प्रस्तुत किए गए थे। अब तो सरकार द्वारा आंकड़ों की हेराफेरी पर कोई आश्चर्य नहीं होता, पर दोनों उत्तर में समान वर्षों के आंकड़े एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं। वर्ष 2025 में राज्य सभा में 2019 का आंकड़ा 35 बताया गया, जबकि 2021 में लोक सभा में इस वर्ष का आंकड़ा 30 बताया गया था। ऐसा ही अंतर वर्ष 2016 से 2018 के आंकड़ों में भी है।
छात्रों के प्रदर्शन ने देश का ध्यान शिक्षा और बेरोजगारी की तरफ तो आकर्षित किया है, पर इससे भी पहले शिशुओं के जिंदा रहने या असमय मौत पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। मोदी सरकार में हरेक असफलता रंगीन विज्ञापनों में खो जाती है, मोदी जी के धाराप्रवाह झूठ में समा जाती है। दूसरी तरफ मोदी सरकार में जो कुछ आंकड़े प्रकाशित किए जाते हैं, उनसे इतना तो स्पष्ट होता है कि डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते सामाजिक सरोकारों में खूब विकास हुआ, पर मोदी सरकार में इस विकास की दर भी धीमी पड़ती जा रही है।
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