
लोकतंत्र में हमारे पास तीन साधन हैं—वोट यानी मतदान, कोर्ट यानी अदालत और विरोध या प्रोटेस्ट। इनमें से केवल एक ही ऐसा साधन है जिस पर भारतीयों का वास्तविक नियंत्रण है, और वह है—विरोध यानी प्रोटेस्ट।
मतदान को ही लोकतंत्र मान लिया जाता है, मानो दो चुनावों के बीच लोकतंत्र खत्म ही हो जाता हो। दशकों तक, भारत की चुनाव प्रक्रिया ने प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता बढ़ाने का काम किया है। वह दौर अब पीछे छूट चुका है।
संविधान हमें बताता है कि, 18 वर्ष से अधिक आयु का प्रत्येक भारतीय, जिसे "इस संविधान या किसी सक्षम विधायिका द्वारा बनाए गए कानून के तहत - निवास न करने, मानसिक रूप से अस्वस्थ होने, अपराध करने, या भ्रष्ट अथवा गैर-कानूनी गतिविधियों में शामिल होने के आधार पर - अयोग्य न ठहराया गया हो," वह किसी भी ऐसे चुनाव में मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने का हकदार होगा।
संविधान का यह निर्देश मौजूदा चुनाव आयोग के लिए एक सुझाव की तरह है। इसमें यह मान लिया गया—जाहिर तौर पर सरकार के आदेश पर—कि करोड़ों लोगों को बिना किसी वजह के मानसिक पीड़ा देने का यह सिलसिला बिना किसी रुकावट के चलता रहेगा।
पिछले चार हफ्तों में कितने फैसले वापस लिए गए या स्पष्टीकरण जारी किए गए, इसका सर्वे करने पर लगभग एक दर्जन मामलों की सूची सामने आती है।
इनमें एक 'विशेष वोटर पंजीकरण अभियान' शामिल है, जिसका मकसद उन लोगों को शामिल करना है जो पिछले 'वोट काटने के विशेष अभियान' (यानी वोटिंग के अधिकार से बेदखल करने वाले अभियान) में छूट गए थे। इसके अलावा, कुछ लोगों के लिए घोषणा-पत्र जमा करने की शर्त को हटाना, कुछ अन्य लोगों के लिए व्यक्तिगत रूप से पेश होने की अनिवार्यता में छूट देना, खराब सॉफ्टवेयर की समीक्षा करना, और मतदाताओं (जिनमें ज्यादातर मुसलमान हैं) के खिलाफ तीसरे पक्ष द्वारा आपत्तियां दर्ज कराने की गलत प्रथा को सीमित करना (पूरी तरह खत्म न करना) भी इसमें शामिल है।
इसके अलावा, अब तक बिना किसी ठोस वजह के—सिर्फ पारदर्शिता न रखने की मंशा से—विरोध करने के बाद, अब सर्च करने लायक मतदाता सूचियां लाई जा रही हैं। और अब निजी स्कूलों के शिक्षकों से भी वे अतिरिक्त काम करवाए जा रहे हैं, जिन्हें करने के लिए सरकारी स्कूलों के बेचारे कर्मचारियों को घर-घर भटकना पड़ता था; इसके अलावा और भी कई काम उनसे लिए जा रहे हैं।
चुनाव आयोग द्वारा उठाए गए कदमों का क्रम और संख्या यह दर्शाती है कि कितनी लापरवाही के साथ इस अभियान की शुरुआत की गई थी। जिस तेजी से ये कदम उठाए जा रहे हैं, उससे घबराहट साफ झलकती है। यह खुलासा कि फैसलों में आयोग के बहुमत की अनदेखी की गई थी, शायद ही किसी के लिए हैरानी की बात रही हो। क्या बाद में किए गए ये सुधार, फैसले वापस लेना और समीक्षाएं इस गड़बड़ी को दुरुस्त कर पाएंगी? बिल्कुल नहीं। हम पहले ही भारतीय नागरिकों के कई स्तरों में बंट चुके हैं: कुछ मतदाता हैं, कुछ के नाम हटा दिए गए हैं, कुछ ने अपील कर रखी है, कुछ को अपनी स्थिति के बारे में कोई जानकारी नहीं है, कुछ ऐसे हैं जिनकी अब कोई परवाह नहीं करता, और कुछ ऐसे हैं जो फैसले के इंतजार में हैं।
इस पूरी तरह से बिगड़े हुए हालात को केवल 'पूरी तरह से वापस पुरानी स्थिति में लौटने' (रोलबैक) के ज़रिए ही ठीक किया जा सकता है। अफ़सोस की बात है कि अब चुनाव हो चुके हैं, इसलिए ऐसा करने से भी चुनावी वैधता को लेकर समस्याएं खड़ी हो जाएंगी—पश्चिम बंगाल इसका साफ उदाहरण है।
इसलिए, नहीं। यह गड़बड़झाला इतने बड़े पैमाने का है कि इसे केवल 'मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ के वास्तुकार द्वारा ही स्थापित किया जा सकता था।
हमारे पास दूसरा लोकतांत्रिक साधन 'अदालत' है। संविधान का अनुच्छेद 32 हमें मौलिक अधिकारों को लागू कराने के लिए अदालत जाने के हमारे अधिकार की गारंटी देता है यानी इसे "सुनिश्चित" करता है। ध्यान दें कि यहां जिस चीज़ की गारंटी दी गई है, वह है अदालत जाने की आज़ादी। इसके बाद अदालती कार्यवाही में क्या होता है, यह हम इस देश में रोज़ देखते ही हैं, इसलिए इस पर और ज़्यादा विस्तार से बात करने की ज़रूरत नहीं है। हमारे बेहतरीन वकील पहले ही बता चुके हैं कि अभी हालात क्या हैं। चुनाव आयोग की तरह ही, यहां भी व्यवस्था कमज़ोर हुई है।
तीसरा लोकतांत्रिक साधन—और इकलौता ऐसा साधन जिस पर हमारा वास्तविक नियंत्रण है—वह है प्रोटेस्ट यानी विरोध-प्रदर्शन। सरकार के सामने जाकर यह जताना कि हमें लगता है कि हमारे अधिकारों का हनन हुआ है और इसे रुकना चाहिए। सरकार हमारे वोट के साथ खिलवाड़ कर सकती है (जैसा कि वह कर रही है), और न्याय व्यवस्था भी, जो कार्यपालिका के इशारे पर काम करती है, हमारे साथ मनमानी कर सकती है। लेकिन हमारे शरीर पर अपना नियंत्रण थोपना उनके लिए मुश्किल होता है, हालांकि वे ऐसा करने की कोशिश ज़रूर करते हैं।
राज्य यानी सरकार के गलत बर्ताव को रोकने के लिए विरोध हमारा सबसे असरदार हथियार है। यही वजह है कि सरकार इसे रोकने, सीमित करने और दबाने की कोशिश में अपनी पूरी ताकत लगा देती है।
जब हज़ारों की संख्या में भारतीयों ने एकजुट होकर दिल्ली के दरवाजों पर पड़ाव डाल दिया तो विवादित कृषि कानून वापस लेना पड़े। सरकार को इन्हें पूरी तरह रद्द करने में पूरा एक साल लग गया, और ये महीने बेकार चले गए क्योंकि सत्ता में बैठे शहंशाह यह नहीं दिखाना चाहते थे कि वे जनता के सामने झुक गए हैं। लेकिन लोगों के एकजुट होते ही कई लोगों को यह साफ़ हो गया था कि जीत जनता की ही होगी। मज़ेदार बात यह रही कि इस जीत के साथ एक माफ़ी भी मिली। यह माफ़ी पूरी तरह से दिल से नहीं मांगी गई थी—जैसा कि इसे मांगने वाले व्यक्ति से उम्मीद की जा सकती है—फिर भी, यह एक माफ़ी तो थी ही।
नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स (एनआरसी) के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करने वाली बहादुर मुस्लिम महिलाओं ने असम में जो कुछ हुआ, उसे भारत के बाकी हिस्सों में होने से रोकने में कामयाबी हासिल की।
हां, यह सच है कि एसआईआर का रास्ता हमें आखिरकार उसी मंजिल तक ले जाता है, लेकिन हाल की घटनाओं से पता चलता है कि सरकार के लिए एनआरसी को बिना किसी विरोध के लागू करना आसान नहीं होगा—भले ही बीजेपी नेतृत्व करोड़ों लोगों को उनके अधिकारों से वंचित करके, उनकी नागरिकता छीनकर और उन्हें हिरासत केंद्रों में डालकर खुश होने के सपने देखता हो।
शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होना (अनुच्छेद 19) एक मौलिक अधिकार है, जिसका अर्थ है कि इसे सरकार के हस्तक्षेप से काफी हद तक सुरक्षा प्राप्त है। लेकिन असल में, पिछले कुछ दशकों में इस स्वतंत्रता पर सरकार का दखल, स्वतंत्रता से कहीं ज्यादा बढ़ गया है। और अब यह स्थिति ऐसी हो गई है कि लोगों को तय की गई जगहों तक ही सीमित रहना पड़ता है और इसके लिए भी सरकार की मंजूरी लेनी पड़ती है। जब तक कि इस अधिकार को वापस न ले लिया जाए—जैसा कि आज दिल्ली की सड़कों पर युवा महिलाएं और पुरुष कर रहे हैं।
हममें से कई लोगों के लिए, यह हमारे दौर की सबसे उत्साहजनक बात है। एक निर्दयी और सत्तावादी सरकार को, हमारे युवाओं ने आखिरकार जोरदार चुनौती दी है।